Gallstone and its home remedies, पित्त की पथरी और घरेलू उपचार………..

Gallstone and its home remedies, पित्त की पथरी और घरेलू उपचार…………

 

किसी कारणवश पित्त (Bile) में बाधा पड़ने पर यह रोग उत्पन्न हो जाता है। जो लोग शारीरिक परिंश्रम न कर मानसिक परिश्रम अधिक करते हैं अथवा बैठे-बैठे दिन व्यतीत करते है तथा नाइट्रोजन और चर्बी वाले खाद्य पदार्थ अधिक मात्रा में खाते हैं, उन मनुष्यों को ही इस रोग से आक्रान्त होने की अधिक सम्भावना रहती है सौ में से दस रोगियों को 40 से 50 वर्ष की आयु के बाद और अधिकतर स्त्रियों को यह रोग हुआ करता है।

आधुनिक वैज्ञानिकों का मत है कि कुछ रोगों के कीटाणु (जैसे-टायफायड के कीटाणु) पित्ताशय में सूजन उत्तपन्न कर देते हैं जिस कारण पथरी बन जाती है। बी-कोलाई (B-Coli) नामक कीटाणु इस रोग का मुख्य कारण माना जाता है। यह पित्ताशय में साधारण रेत के करणों (1 से 100 तक) से लेकर दो इन्च लम्बी और एक इन्च तक चौड़ी होती है। पथरी जब तक पित्ताशय में रुकी रहती है तब तक रोगी को किसी भी तरह की कोई तकलीफ महसूस नहीं होती है। कभी-कभी पेट में दर्द मालूम होता है। किन्तु जब यह पथरी पित्ताशय से निकलकर पित्त-वाहिनी नली में पहुँचती है, तब पेट में एक तरह का असहनीय दर्द पैदा होकर रोगी को व्याकुल कर देता है। इस भयानक दर्द को पित्तशूल कहते है।

यह शूल दाहिनी कोख से शुरू होकर चारों ओर (दाहिने कन्धे और पीठ तक) फैल जाता है। और दर्द के साथ अक्सर कै (वमन) ठण्डा पसीना, नाड़ी कमजोर, हिंमांग (Callapse) कामला, साँस में कष्ट, मूर्छा आदि के लक्षण दिखलायी देते हैं। यह दर्द कई धन्टों से लेकर कई सप्ताह तक रह सकता है और जब पथरी आँत के अन्दर आ जाती हैं तब रोगी की तकलीफ दूर हो जाती है। और रोगी सो जाता है। जब तक पथरी स्थिर भाव में रहती है तब तक तकलीफ घट जाती है और जब पथरी हिलती डुलती है उसी समय तकलीफ पुनः बढ़ जाया करती है। इस प्रकार पथरी के हिलने-डुलने से तकलीफ बढ़ती-घटती रहती है यह क्रम कई অन्टों से लेकर कई सप्ताह तक चल सकता है। पित्ताशय शुल के लक्षण स्पष्ट होने पर पित्त पथरी का ज्ञान हो जाता है। यदि वैद्य (चिकित्सक) को निदान में सन्देह हो तो तुरन्त क६ (X-Ray) करा लेना चाहिए।

पित्त की पथरी के प्रमुख शास्त्रीय योग- Gallstones Annihilation Major Classical Yoga:- 

रस:- त्रिविक्रम रस 250 मि.ग्रा. दिन में 2 बार मधु से सभी प्रकार की अश्मरी में दे । पाषाण वज्रक रस 500 मि.ग्रा. से 1 ग्राम तक दिन में 2-3 बार कुलुभी क्वाथ से दें। सभी प्रकार की अश्मरी में लाभप्रद है । अपूर्वमालिनी बसन्त 125 मि.ग्रा. तक दिन में 2 3 बार बिजौरा निम्बूरस से दें।

क्रव्यादि रस 125-250 (मात्रा, अनुपान, लाभ, उपर्युक्त।

लौह- धात्री लौह व षरुणाद्य लौह 500 मि. ग्रा. दिन में 2 बार मधु से दें । समस्त अश्मरियों में लाभप्रद है।

भस्म- बदर पाषाण भस्म व वराटिका भस्म अनुपान नारिकेल जल से, अश्मरी भेदन हेतु वराटिका भस्म, पित्ताश्मरी में शूल शरमनार्थ।

गुग्गुल- गोकुरादि गुग्गुल 2 गोली दिन में 2 3 बार दुग्ध से दें वात श्लेष्म विकृति पर दें।

वटी- सर्वतो भद्दवटी 1 गोली दिन में 2 बार वह्वणादि क्वाथ से दें। लाभ वात कार्य उपसुका । चन्द्रप्रभा वटी 1 गोली दिन में 2 बार मूलक स्वरस दें। (लाभ उपर्युक्त) वात श्लैष्म वकृति पर। शिवा वटी मात्रा 2 गोली दिन में 2-3 बार शर्बत बिजूरी से लाभ उपरोक्त ।

क्षार पर्पटी- श्वेत पर्पटी 500 मि.ग्रा. नारिकेल जल से दिन में 3 बार, यवक्ार S00 मि.ग्रা. से 1 ग्राम तक अविमूत्र से तथा तिलादि क्षार मात्रा उपर्युक्त जल से दें । अश्मरी भेदक, मूत्र कुच्छ हर है।

चूर्ण- गोक्षुर चुर्ण, 3 ग्राम दिन में 2-3 बार अविदुग्ध से तथा पाषाण भेदादि चूर्ण उपयुक्त मात्रा में गौमूत्र से अश्मरी भेदक तथा मूत्र कृच्छहर उत्तम चूर्ण है।

आसव- चन्दासव पित्तानुबन्ध होने पर, पुनर्नवासव वातानुबन्ध होने पर, 15 से 25 मि. ली. समान जल मिलाकर भोजनोत्तर।

घृत- वरुणादि घृत, पाषाण भेदादि घृत, कुशादि घृत, कुलत्यादि घृत 5 से 10 ग्राम दिन में 2 बार गौ दुग्ध से सब प्रकार की अश्मरियों में कुछ समय लेने पर लाभदायक है।

अवलेह पाक- कुशावलेह पाषाण भेदक पाक 5 से 10 ग्राम दिन में 2 बार गोदुग्ध से लाभ उपर्युक्त है।

क्वाथ- वीरतव्वादि क्वाथ कफज में, पाषाण भेदादि क्वाथ वातज में, एलादि क्वाथ पित्तज में 20 मि.ली. दिन में दो बार।

त्रिकंटकादि क्वाथ 40 मि.ली. दिन में 2 बार 250 से 500 मि.ग्रा. शिलाजी मिलाकर-सभी प्रकार की अश्मरियों में लाभप्रद है।

चिकित्सा सूत्र- नया अश्मरी रोग औषधि से ठीक हो जाता है।, किन्तु पुराना शस्त्र कर्म से ठीक होता है। इस रोग में घृत पान करवाकर स्नेहन कराना उपयोगी है।

पित्त-की-पथरी-के-आयुर्वेदीय-पेटेण्ट-योग

सिस्टोन टेबलेट (हिमालय ड्रग)- 2 गोली दिन में 3-4 बार अश्मरी के निकल जाने तक यह अश्मरी को बाहर निकालने के लिए अत्यन्त निरापद प्रमाणित हुई है। कुछ समय तक नियमित सेवन से अश्मरी टूट-टूट कर बाहर निकल जाती है। मूत्रकृच्छ तथा मूत्र में जलन आदि में भी उपयोगी है।

आरूसिलन टेबलेट (चरक)- 1-2 गोली दिन में 3-4 बार। यह मूत्र मार्ग के तमाम रोगों में लाभकारी है, मूत्र खुलकर लाती है।, अश्मरी भेदक है। मूत्रल पाउडर (वैद्यनाथ) अवस्थानुसार एवं पत्रक में लिखे निर्देशानुसार दें। यह मूत्र खुलासा लाने के लिए उत्तम पाउडर है। अश्मरी- जन्य शूल में पंशाब लाकर शूल को शान्त करता है।

सूचीवेध- अपामार्ग (बुन्दलेखन्ड, जी.ए. मिश्रा) मूत्रकृच्छान्तक (जी.ए. मिश्रा) इन्द्रायन (जी.ए. मिश्रा, बुन्दलेखन्ड) गौखरू (जी.ए. मिश्रा , बुन्देलखन्ड) चन्दन (जी.ए. मिश्रा) सभी सूचीवेध मूत्रल तथा अश्मरी नाशक है। पापाण भेद (बुन्देलखन्ड) वरून, (बुन्देलखन्ड) मूत्रल (ए. वी एम.) शिलाजीत। सभी सूचीवेध मूत्र जनन की प्रक्रिया को बढ़ाते है । अश्मरी व मूत्राघात में लाभकर है। मूत्राशमरी में विशेष लाभदायक है। मात्रा-समस्त सूची वेधों की 1 से 2 मि.ली. तक मांसपेशी में।

पित्त की पथरी कुछ घरेलू योग,Gallstones  :-

प्याज को कतरकर जल से धोकर उसका 20 ग्राम रस निकाल कर उसमें 50 ग्राम मिश्री मिलाकर पिलाने से पथरी टूट कर पेशाब के द्वारा बाहर निकल जाती है।

नीबू का रस 6 ग्राम, कलमी शोरा 4 रक्ती, पिसे तिल 1 ग्राम ( यह खुराक की मात्रा है) शीतल जल के साथ दिन में 1 या 2 बार 21 दिन तक सेवन कराने से पथरी गल जाती है ।

मूली में गड्ढ़ा खोद उसमें शलगम के बीज डालकर गूँथा हुआ आटा ऊपर से लपेट कर भूभल में सेके। जब भरता हो जाये या पक जाये तब आग से निकालकर आटे को अलग कर खावें । पथरी-टुकड़े-टुकड़े होकर निकल जाती है।

पपीते की जड़ ताजी 6 ग्राम को जल 60 ग्राम में पीस छानकर 21 दिन तक पिलाने से पथरी गलकर निकल जाती है।

केले के खम्भे के रस या नारियल के 3-4 औंस जल में शोरा 1-1 ग्राम मिलाकर दिन में दो बार देते रहने से अश्मरी कण निकल जाते हैं और पेशाब साफ आ जाता है।

अशोक बीज 6 ग्राम को पानी के साथ सिल पर महीन पीसकर थोडे, से जल में घोलकर पीने से कुछ दिन में ही पथरी निर्मूल हो जाती है।

मूली का रस 25 ग्राम व यवक्षार 1 ग्राम दोनों को मिलाकर रोगी को पिलायें। पथरी गलकर निकल जायेगी।

टिडे का रस 50 ग्राम, जवाखार 16 ग्रेन (1 ग्रेन=31 चावल भर) दोनों को मिलाकर पीने से पथरी रेत बनकर मूत्र मार्ग से बाहर निकल जाती है।

केले के तने का जल 30 ग्राम, कलमी शोरा 25 ग्राम दूध 250 ग्राम तीनों को मिलाकर दिन में दो बार पिलायें । दो सप्ताह सेवन करायें । पथरी गलकर निकल जाती है।

सीताफल :-

लाल रग का कूष्मान्ड (सीताफल) खूब पका हुआ लेकर 250 ग्राम रस निकालें इसमें 3 ग्राम सेन्धा नमक मिलाकर पिला दें। प्रयोग दो सप्ताह नियमित दिन में 2 बार करायें । पथरी गलकर मूत्र मार्ग से निकल जाती है।

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Asthma (अस्थमा): Symptoms, Causes, Treatments…………….

Asthma (अस्थमा): Symptoms, Causes, Treatments…………………..

 

अस्थमा एक ऐसी स्थिति है जिसमें आपके वायुमार्ग संकीर्ण और सूज जाते हैं और अतिरिक्त बलगम का उत्पादन करते हैं। इससे सांस लेना मुश्किल हो सकता है और खाँसी, घरघराहट और सांस की तकलीफ हो सकती है।

कुछ लोगों के लिए, अस्थमा एक मामूली समस्या है। दूसरों के लिए, यह एक बड़ी समस्या हो सकती है जो दैनिक गतिविधियों में दखल देती है और इससे दमा का खतरा पैदा हो सकता है।

जिन लोगों को अस्थमा है, वे ऐसे लक्षण अनुभव कर सकते हैं जो हल्के से लेकर गंभीर तक हो सकते हैं और ऐसा शायद ही कभी या हर दिन हो। जब लक्षण बदतर हो जाते हैं, तो इसे अस्थमा का दौरा कहा जाता है। अस्थमा सभी उम्र के लोगों को प्रभावित करता है और अक्सर बचपन के दौरान शुरू होता है।

अस्थमा के लक्षण और संकेत क्या हैं? (What are Asthma Symptoms and Signs?)

अस्थमा के लक्षणों में शामिल हैं:-

साँसों की कमी
सीने में जकड़न या दर्द
सांस लेने में तकलीफ, खांसी या घरघराहट के कारण नींद में परेशानी
सांस छोड़ते समय सीटी बजना या घरघराहट की आवाज आना (बच्चों में अस्थमा का एक सामान्य लक्षण है)

सर्दी या फ्लू जैसे श्वसन वायरस द्वारा खराब होने वाले खांसी या घरघराहट के दौरे।
इन लक्षणों के होने का मतलब हमेशा यह नहीं होता है कि आपको अस्थमा है। आपका डॉक्टर फेफड़ों के कार्य परीक्षण, आपके चिकित्सा इतिहास और एक शारीरिक परीक्षा के आधार पर अस्थमा का निदान करेगा। आपका एलर्जी परीक्षण भी हो सकता है।

जब आपके अस्थमा के लक्षण सामान्य से बदतर हो जाते हैं, तो इसे अस्थमा का दौरा कहा जाता है। गंभीर अस्थमा के हमलों में आपातकालीन देखभाल की आवश्यकता हो सकती है, और वे घातक हो सकते हैं।

अस्थमा का क्या कारण हैं? (What Causes of Asthma?)

अस्थमा का सटीक कारण अज्ञात है, और इसके कारण अलग-अलग हो सकते हैं। हालांकि, अस्थमा का परिणाम किसी व्यक्ति के वंशानुगत आनुवंशिक श्रृंगार और पर्यावरण के साथ पारस्परिक क्रियाओं के बीच जटिल संबंधों से होता है। अस्थमा के जोखिम कारक निम्नलिखित हैं:

एलर्जी का पारिवारिक इतिहास हे फीवर का व्यक्तिगत इतिहास (एलर्जिक राइनाइटिस)
वायरल श्वसन संबंधी बीमारी, जैसे कि श्वसन सिंकिटियल वायरस (RSV), बचपन के दौरान
सिगरेट के धुएं के संपर्क में आना
मोटापा,वायु प्रदूषण या जलते हुए बायोमास के संपर्क में आना

अस्थमा का इलाज क्या हैं? (What are the Treatment of Asthma?)

यदि आप ज्यादातर लोगों की तरह हैं जिन्हें अस्थमा है, तो उपचार आपके लक्षणों का प्रबंधन कर सकता है, जिससे आप सामान्य गतिविधियों को फिर से शुरू कर सकते हैं और अस्थमा के हमलों को रोक सकते हैं। उपचार आमतौर पर आपकी उम्र, अस्थमा की गंभीरता और उपचार के लिए दिए गए विकल्प पर आपकी प्रतिक्रिया पर निर्भर करता है। अस्थमा के लक्षणों को नियंत्रित करने तक आपका डॉक्टर आपके उपचार को समायोजित कर सकता है।

इनहेलर :-

अस्थमा के हमले के दौरान या जब लक्षण बिगड़ जाते हैं, तो ज्यादातर लोगों को अस्थमा के इलाज के लिए दवा के साथ-साथ दैनिक दवा के साथ इलाज किया जाता है, जिन्हें दीर्घकालिक नियंत्रण दवा कहा जाता है। एक इनहेलर दवा को मुंह और वायुमार्ग में जाने की अनुमति देता है।

भड़कने की स्थिति में :-

अस्थमा भड़कने की स्थिति में, आपको अल्ब्यूटेरोल जैसे त्वरित-राहत इन्हेलर का उपयोग करने की आवश्यकता हो सकती है।

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Back Pain (पीठ दर्द): Symptoms, Causes and Treatments……….

Back Pain (पीठ दर्द): Symptoms, Causes and Treatments………………

 

यदि आपको पीठ दर्द रहता हैं, तो आप अकेले नहीं हैं। पीठ दर्द सबसे आम चिकित्सा समस्याओं में से एक है, जो 10 में से 8 लोगों को उनके जीवन के दौरान किसी न किसी बिंदु पर प्रभावित करता है। पीठ दर्द एक सुस्त, निरंतर दर्द से लेकर अचानक तेज दर्द तक हो सकता है। तीव्र पीठ दर्द अचानक आता है और आमतौर पर कुछ दिनों से कुछ हफ्तों तक रहता है। यदि तीन महीने से अधिक समय तक रहता है तो पीठ दर्द को क्रोनिक कहा जाता है।

अधिकांश पीठ दर्द अपने आप दूर हो जाता है, हालांकि इसमें थोड़ी देर लग सकती है। यदि आपकी पीठ दर्द गंभीर है या तीन दिनों के बाद सुधार नहीं होता है, तो आपको अपने स्वास्थ्य देखभाल प्रदाता से बात करनी चाहिए। अगर आपको चोट लगने के बाद पीठ में दर्द हो, तो आपको चिकित्सीय ध्यान देना चाहिए।

पीठ दर्द के संकेत और लक्षण (Signs and Symptoms of Back Pain)

पीठ दर्द का मुख्य लक्षण पीठ में कहीं भी दर्द है, और कभी-कभी सभी नितंबों और पैरों के नीचे होता है।

कुछ पीठ के मुद्दे शरीर के अन्य हिस्सों में दर्द का कारण बन सकते हैं, जो प्रभावित नसों पर निर्भर करता है।

दर्द अक्सर इलाज के बिना चला जाता है, लेकिन अगर यह निम्न लोगों में से किसी के साथ होता है, तो उन्हें अपने डॉक्टर को देखना चाहिए:

मांसपेशियों में दर्द
शूटिंग या छुरा दर्द
दर्द जो आपके पैर को विकीर्ण करता है
दर्द जो झुकने, उठाने, खड़े होने या चलने के साथ बिगड़ता है
दर्द जो पुनरावृत्ति के साथ सुधार करता है

पीठ दर्द का कारण (Causes of Back Pain)
आमतौर पर पीठ दर्द से जुड़ी स्थितियों में शामिल हैं:

मांसपेशियों या स्नायुबंधन (Ligament) का तनाव–

बार-बार हैवी लिफ्टिंग या अचानक अजीब हरकत करने से पीठ की मांसपेशियों और स्पाइनल लिगामेंट्स में खिंचाव आ सकता है। यदि आप खराब शारीरिक स्थिति में हैं, तो आपकी पीठ पर लगातार खिंचाव से मांसपेशियों में ऐंठन हो सकती है।

उभरा हुआ या टूटा हुआ डिस्क-

डिस्क आपकी रीढ़ में हड्डियों (कशेरुक) के बीच कुशन का काम करती है। एक डिस्क के अंदर नरम सामग्री उभार या टूटना और एक तंत्रिका पर दबा सकती है। हालांकि, आपको पीठ दर्द के बिना एक उभड़ा हुआ या टूटा हुआ डिस्क हो सकता है। डिस्क रोग अक्सर संयोग से पाया जाता है।

गठिया (Arthritis)-

ऑस्टियोआर्थराइटिस पीठ के निचले हिस्से (Lower Back) को प्रभावित कर सकता है। कुछ मामलों में, रीढ़ की हड्डी में गठिया रीढ़ की हड्डी के चारों ओर अंतरिक्ष की एक संकीर्णता पैदा कर सकता है, एक ऐसी स्थिति जिसे स्पाइनल स्टेनोसिस कहा जाता है।

कंकाल की अनियमितता-

एक ऐसी स्थिति जिसमें आपकी रीढ़ की हड्डी हलकी मुड़ जाती है, जिससे पीठ में दर्द हो सकता है, लेकिन आम तौर पर यह मध्यम आयु तक नहीं होता है।

ऑस्टियोपोरोसिस-

यदि आपकी हड्डियां छिद्रपूर्ण और भंगुर हो जाती हैं, तो आपकी रीढ़ की कशेरुक संपीड़न फ्रैक्चर विकसित कर सकती है।

जोखिम (Risk Factors)

किसी को भी पीठ दर्द हो सकता है, यहां तक कि बच्चे और किशोर को भी Back Pain होता है, निम्न कारक आपको पीठ दर्द के विकास के अधिक जोखिम में डाल सकते हैं:

उम्र- लगभग 30 या 40 वर्ष की उम्र में, पीठ दर्द अधिक आम है।
व्यायाम की कमी- कमजोर मांसपेशियां, आपकी पीठ दर्द का कारण हो सकती हैं।

अधिक वज़न- शरीर का अतिरिक्त वजन आपकी पीठ पर अतिरिक्त तनाव डालता है।
रोग- कुछ प्रकार के गठिया और कैंसर पीठ दर्द में योगदान कर सकते हैं।

गलत तरीके से वजनउठाना- अपने पैरों के बजाय अपनी पीठ का उपयोग करने भारी वजन उठाने से पीठ दर्द हो सकता है।

मनोवैज्ञानिक स्थिति- अवसाद (Depression) और चिंता से ग्रस्त लोगों में पीठ दर्द का अधिक खतरा होता है।

धूम्रपान- धूम्रपान रीढ़ की ओर रक्त प्रवाह को कम करता है, जो आपके शरीर को आपकी पीठ में डिस्क तक पर्याप्त पोषक तत्व पहुंचाने से रोक सकता है।

पीठ दर्द का इलाज कैसे किया जाता है? (How is Back Pain Treated?)

पीठ दर्द के लिए उपचार इस बात पर निर्भर करता है कि आपको किस तरह का दर्द है, और यह क्या कारण है। इसमें गर्म या ठंडे पैक, व्यायाम, दवाएं, इंजेक्शन, पूरक उपचार और कभी-कभी सर्जरी शामिल हो सकते हैं।

आमतौर पर सामान्य पीठ दर्द कुछ हफ्तों या महीनों के भीतर ठीक हो जाता है।

क्या पीठ दर्द को रोका जा सकता है? (Can Back Pain be Prevented?)

आप अपनी शारीरिक स्थिति में सुधार और उचित शरीर यांत्रिकी सीखने और अभ्यास करके पीठ दर्द से बच सकते हैं या इसकी पुनरावृत्ति को रोक सकते हैं।

अपनी पीठ को स्वस्थ और मजबूत रखने के लिए:

व्यायाम करें-

नियमित रूप से कम प्रभाव वाली एरोबिक गतिविधियां – जो आपकी पीठ को तनाव या झटका नहीं देती हैं – आपकी पीठ में ताकत और धीरज बढ़ा सकती हैं और आपकी मांसपेशियों को बेहतर कार्य करने की अनुमति देती हैं। पैदल चलना और तैरना अच्छे विकल्प हैं।

मांसपेशियों की ताकत और लचीलापन बनाएं-

पेट और पीठ की मांसपेशियों के व्यायाम, जो आपके कोर को मजबूत करते हैं, इन मांसपेशियों की स्थिति में मदद करते हैं ताकि वे आपकी पीठ के लिए एक प्राकृतिक कोर्सेट की तरह एक साथ काम करें। आपके कूल्हों और ऊपरी पैरों में लचीलापन आपकी पेल्विक हड्डियों को संरेखित करता है ताकि आपकी पीठ को अच्छा महसूस हो।

स्वस्थ वजन बनाए रखें-

अधिक वजन होने से पीठ की मांसपेशियों में खिंचाव होता है। यदि आप अधिक वजन वाले हैं, तो वजन घटने से पीठ दर्द को रोका जा सकता है।

धूम्रपान छोड़ने- छोड़ने के तरीकों के बारे में अपने डॉक्टर से बात करें।

ऐसे आंदोलनों से बचें जो आपकी पीठ को मोड़ते हैं या तनाव देते हैं। अपने शरीर का सही तरीके से उपयोग करें:

अच्छे तरीके से खड़े रहे।
अच्छे तरीके से बैठे।
सही तरीके से वजन उठाए।

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Anemia and its home remedies , खून की कमी और इसके घरेलू उपचार……….

Anemia and its home remedies , खून की कमी और इसके घरेलू उपचार……………..

 

किसी कारण वश शरीर का खून घट जाये तथा खून में जो लाल कण होते हैं, उनकी संख्या घट जाये तो उसे ही रक्त होनता या रक्ताल्पता अर्थात खून की कमी कहा जाता है। अधिक मैथुन, श्वेत प्रदर, क्षय, यकृत या विटामिनों की कमी, रक्तस्राव (चोट लगने से) होना, टायफाइड बुखार या कोई घाव हो जाने पर प्रसव के पहले या बाद में अत्यधिक रक्तस्राव, बवासीर, पौष्टिक खाद्य पदार्थो का न मिलना, पुराना अजीर्ण, अन्य संक्रामक रोग जैसे-मलेरिया, डिप्पीरिया, न्यूमोनियां आदि, के कारण यह रोग हो जाता है।

रोगी का चेहरा कान्तिहीन, त्वचा पीली सफेद या हरी तथा आँखें धँसी हुई, मुख और जीभ सफेद तथा हाथ व पैरों के नाखून सफेद और रक्तशून्य दिखलायी पड़ते हैं। इसके अतिरिक्त अजीर्ण, भूख न लगना, नींद न आना, कब्ज, कलेजा धड़कना, थोड़े परिश्रम से ही थक जाना हाँफने लगना, श्वास-कष्ट, हाथ पैर फूल जाना, सिर में चक्कर आना, हथेलियों तथा तलवों में जलन, शरीर का ताप कम हो जाना, शरीर में किसी भाग से रक्तस्त्राव होना तथा कभी-कभी दिल के दौरे पड़ना आदि लक्षण प्रकट होते हैं।

यह रोग आमतौर से ठीक हो जाता है। पुराने रोग में कामला (जान्डिस) और जलोदर रोग हो जाता है।

उपचार- Treatment:- 

प्रायः इस रोग का उपचार लौहयुक्त औषधियों जैसे-लोहासव द्राक्षासव आदि से किया जाता है।  इन्हीं औषधियों के उचित चिकित्सा व्यवस्था पत्र में उचित आहर-विहार एवं पथ्य से रोगी पूर्णतः स्वस्थ हो जाता है।

एक व्यक्ति घर पर हीमोग्लोबिन का स्तर बढ़ने के लिए निम्न चीज कर सकता है, जिसमें कई तरह के विटामिन और पोषक तत्व शामिल हैं:-

1) आयरन के सेवन को बढ़ाएं (Increase Iron Intake)

आयरन रक्त उत्पादन के लिए एक आवश्यक तत्व है। आपके शरीर का लगभग 70 प्रतिशत आयरन आपके रक्त की लाल रक्त कोशिकाओं में पाया जाता है जिसे हीमोग्लोबिन कहा जाता है।

हीमोग्लोबिन के कम स्तर वाले व्यक्ति अधिक आयरन युक्त खाद्य पदार्थ खाने से लाभान्वित हो सकते हैं। आयरन हीमोग्लोबिन के उत्पादन को बढ़ावा देने का काम करता है, जो अधिक लाल रक्त कोशिकाओं को बनाने में भी मदद करता है।

आयरन युक्त खाद्य पदार्थों में शामिल हैं:,मांस और मछली ,अंडे ,साग, सभी प्रकार के
ब्रोकोली,मटर,गोभी,अंकुरित फलियां,टमाटर,आलू,मक्का,बीट,गोभी,नट्स और बीज,सूखे मेवे,,खजूर और अंजीर,सोया उत्पादों, टोफू और सोया दूध
मूंगफली और पीनट बटर

2) फोलेट का सेवन बढ़ाएं (Increase Folate Intake)

फोलेट, या फोलिक एसिड – जिसे विटामिन-B9 के रूप में भी जाना जाता है, आपके शरीर को नई कोशिकाओं का उत्पादन करने में मदद करता है और लाल रक्त कोशिका के गठन के लिए आवश्यक है। यदि आपको पर्याप्त फोलिक एसिड नहीं मिलता है तो आपका हीमोग्लोबिन कम हो जाएगा। इसे एनीमिया कहा जाता है।

फोलेट के अच्छे स्रोतों में शामिल हैं:,अंडे,एवोकाडो,चुकंदर,पपीता,केले,चावल,राज़मा,मूंगफली,हरी पत्तेदार सब्जिया, पालक और ब्रोकोली,खट्टे फल, संतरे, अंगूर और नींबू

3) विटामिन-B12 का सेवन बढ़ाएं (Increase Vitamin-B12 Intake)

विटामिन-B12 शरीर के कई कार्यों के लिए महत्वपूर्ण हैं। लेकिन विटामिन-B12 की सबसे महत्वपूर्ण भूमिकाओं में से एक लाल रक्त कोशिकाओं के उत्पादन में है, ये कोशिकाएं हीमोग्लोबिन नामक प्रोटीन की मदद से पूरे शरीर में ऑक्सीजन ले जाती हैं।

विटामिन-B12 की कमी से एनीमिया, या रक्त प्रवाह में लाल रक्त कोशिकाओं और हीमोग्लोबिन की मात्रा में कमी हो सकती है।

विटामिन-B12 के अच्छे स्रोतों में शामिल हैं:,मांस,मछली,अंडे,मशरूम,डेयरी उत्पाद जैसे दूध, दही, पनीर
विटामिन B12 प्राकृतिक रूप से पशु उत्पादों में पाया जाता है, लेकिन यह पौधे आधारित खाद्य पदार्थों में मौजूद नहीं होता है।

4) विटामिन-C का सेवन बढ़ाएं (Increase Vitamin C Intake)

विटामिन-C शरीर को बेहतर दर पर आयरन को अवशोषित करने में मदद करता है, इसके अलावा विटामिन-C लाल रक्त कोशिकाओं को संश्लेषित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

आयरन हीमोग्लोबिन का मुख्य हिस्सा है, इसलिए विटामिन-C का सेवन करे जो आयरन अवशोषण को बढ़ाने में मदद कराता है।

विटामिन-C के अच्छे स्रोतों में शामिल हैं:,खट्टे फल, संतरे और अंगूर,आम,पपीता,अनानास,स्ट्रॉबेरी,तरबूज,ब्रोकोली, फूलगोभी,हरी और लाल मिर्च,पालक, पत्ता गोभी और अन्य पत्तेदार साग,शकरकंद और सफेद आलू,टमाटर,कद्दू

मल्टीविटामिन के बारे में सोचे:

यदि आप अपने द्वारा खाए जा रहे भोजन से पर्याप्त विटामिन प्राप्त नहीं कर पाते हैं, तो अपने डॉक्टर से पूछें कि क्या आपके लिए एक मल्टीविटामिन सही हो सकता है।

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एसिडिटी क्या है और इसके घरेलू उपचार, acidity and its home remedies………

एसिडिटी क्या है और इसके घरेलू उपचार, acidity and its home remedies………………

 

दुष्ट, अम्ल विदाही तथा तीक्ष्ण पदार्थो के सेवन से, चबी वाली खाद्य वस्तुएँ अधिक खाने से, अधपका माँस खाने से, दाँत खराब होने के कारण तथा भोजन का ठीक प्रकार पाचन न होने आदि कारणों से यह रोग हो जाता है संक्षेप में यह रोग बदहज्मी का साधारण सा लक्षण है खाई हुए खुराक में खटास उत्पन्न होकर यह रोग होता है। कौड़ी प्रदेश में पीड़ा, जलन और शोध होती है भोजन के 1-2 घन्टे बाद यह लक्षण दिखलायी देता है। खाना (मीटा) सोड़ा लेने से वेदना थोड़ी देर के लिए शान्त हो जाती है खट्टी डकारें तो कभी -कभी तो इतनी आती है कि मुख खट्टा पानी सा आने लग जाता है जिससे स्वाद बिगड़ जाता है अधपचा भोजन मल में निकलता है कभी-कभी रोगी को अतिसार (दस्त ) भी हो जाते हैं।

रोग बढ़ने पर अरुचि, शिर :शूल, उबकाई, उदरशूल ( आमाशयिक पीडा) तथा चमड़ी पर चकत्ते निकलना आदि लक्षण भी हो जाते है ।

उपचार- Treatment:- 

भोजन की ओर विशेष ध्यान दें। शराब, माँस, मिर्च, मसाले, चाय, काफी, तम्बाकू छुड़वा दें। आँवला या अनार को छोड़कर कोई अन्य खट्टा फल खाने को न दें। मैदायुक्त भोजन, आलु, गरिष्ठ भोजन, बासी भोजन तथा अधिक मात्रा में शंक्कर या इससे बनी मिठांइयाँ न दें। नये रोग में अण्डे, मछली, दूध पनीर आदि केवल प्रोटीन वाली वस्तुएँ दें। कुछ दिन बाद आराम होने पर मक्खन, मलाई आदि की चिकनी वस्तुएँ देना आरम्भ करें। सुबह अन्डा, में हल्का भोजन, दोपहर में दूध तीसरे पहर मक्खन लगे टोस्ट, और शाम को हल्का खाना दें। खाने के बाद खाना सोड़ा (सोड़ा बाई कार्ब) या जैतून का तेल (ओलिव आयल) या चूने का पानी नित्य 10 ग्राम तक थोड़ा-थोड़ा करके पिलायें। इससे अम्ल रस कम बनेगा खाना (मीठा) सोड़ा शहद में मिलाकर 4-4 घन्टे बाद चटाने से भी लाभ मिलता है।

पथ्य-Diet:- मूँग, पुराना चावल, करेला, पटोल-घृत, गेहूँ करेज तिस एवं लघु शाक, पिप्पली हरड अकिदाही आहार लहसुन, मधु आदि।

अपध्य-Irreplaceable:- वमन सम्बन्धी सभी वेगों की रोकथाम तिल, तेल, लवण. दही, मध्यपान, गुरूपाकी, अन्न, अम्लयुक्त पदार्थ, पित्त-प्रकोपी आहार आदि।

अम्लपित्त जाशक प्रमुख शास्त्रीय योग-Acetic acid

रस-Juice- काम दुधारस ( मुक्तायुक्त) लीलाविलास रस सूतशेखर रस, अम्लपित्तान्तक रस, सर्वतोभ्रद रस, प्रवाल पंचामृत 125 से 250 मि.ग्रा. वयस्कों को दिन में दो बार । आमलकी घृत अथवा मधु ।

लौह-Iron-

धात्री लौह, अम्लपित्तान्तक लौह अभ्रलौह, चतुः सम मान्डूर सिता-मान्डूर 250 मि.ग्रा. से 500 मि.ग्रा. दिन में 2 3 बार भोजनोपरान्त, मधु+ घृत अथवा सिता+त्रिफलातिक्ता क्वाथ या ताजे जल आदि अनुपान के साथ ।

भस्म-Incinerated प्रवाल भस्म 15 से 25 मि.ग्रा. ताम्रभस्म 60 मि.ग्रा., शंख भस्म 125 मि.ग्रा. कपर्द भस्म 250 मि.ग्रा. से 1 ग्राम तक मधु अथवा जल या मधु के साथ प्रयोग करायें।

पिष्टी-Pishtiमुक्ता पिष्टी 125 मि.ग्रा. दिन में 2 बार, मुक्ता-शुक्त पिष्टी 250 से 500 मि.ग्रा. दिन में 2 3 बार मधु से सेवनीय ।

वटी-Banyan द्राक्षादि वटी, 1 गोली रात्रि में सोते समय, उष्ण जल से संशमनी वटी 2 गोली शीतल जल से। पानीय भक्त वटी 1 गोली दिन में 2 बार काँजी से ।

आसव-Infusion- कुमार्यासव पुनर्नवारिष्ट, सारिवाद्यासव 15-से 25 मि. ली. समान भाग जल मिलाकर भोजनोपरान्त सेवनीय।

चूर्ण-Powder- अविपत्तिकर चूर्ण, 3 से 5 ग्राम। पंचनिम्बादि चूर्ण 3 ग्राम। एलादि चूर्ण, दशक्षार चूर्ण (मात्रा उपर्युक्त) त्रिकट्वादि चूर्ण 1 ग्राम शीतल जल नारियल के जल अथवा मधु या ताजे जल से प्रात: सायं अथवा भोजन के बाद दें।

धृत-Dhrita-

शतावरी धृत, जीरकाद्य धृत, द्राक्षादि धृत में से कोई एक से तीन ग्राम तक सेवन करवायें। नारिकेल खन्ड पाक, आग्रपाक, कुष्माण्डावलेह, जीरकावलेह, द्राक्षावलेह, हरीतकी खण्ड, पिप्पली खण्ड, शुण्ठी खण्ड 5 से 10 ग्राम सायंकाल दुग्ध से दिलवायें। सर्जिक्षार, नारिकेल लवण, ऊर्ध्वांग 500 मि.ग्रा. से 2 ग्राम तक तथा चूर्णोदक 10 ग्राम तक शीतल जल से दिन में 2-3 बार तक दें। पोटलादि क्वाथ 10 मि.ली. सिता मिलाकर प्रयोग कराया जा सकता है।

अम्लपित्त चिकित्सा सूत्र- Acidity medicine formula:-

सामान्यतः अम्लपित्त में कफ, पित्त नाशक चिकित्सा करनी चाहिए। इसके लिए वमन तथा विरेचन चिकित्सा श्रेष्ठ है। विशेषतः ऊर्ध्वाङ्ग अम्लपित्त में वमन तथा निम्नांग अम्लपित्त में रेचन कराया जाना चाहिए। इसके पश्चात् भी यदि दोषों की शान्ति न हो तो युक्तिपूर शिराच्छेद करके रक्त मोक्षण भी कराना चाहिए प्रधान दोष की शामक चिकित्सा तथा तदनुसार आहार का उपयोग कराना चाहिए ।

शुक्ति टेबलेट (अलारसिन)-Shukti Tablet (Alarsin)-

भोजन के मध्य या पश्चात 2-2 टिकिया 3 बार तथा लक्षणों की उग्रता में दिन में 3-4 बार 3 से 6 गोलियाँ एक साथ दें। बच्चों को % गोली दिन में 3 बार अम्लपित्त की सभी अवस्थाओं में श्रेष्ठ लाभकर है। आमाशय शोथ परिणाम शूल, अन्नद्रव शूल, पेप्टिक अल्सर आदि सभी अवस्थाओं में अत्यन्त निरापद औषधि है।

मैनोल टेबलेट (चरक)-Manol Tablet (Charak)- 2 गोली दिन में 2-3 बार जल या दूध के साथ बच्चों को % से 1 गोली दें छाती की जलन में शीघ्र प्रभावकारी तथा अम्लपित्त नाशक अति उत्तम सिद्ध हुई है।

अभयासिन गोली (झण्ड)-Exercise pill (flag)-

2 से 4 गोली गर्म जल या दूध के साथ दिन में 3 बार दें। अम्लपित्त नाशक तथा मलावरोध में भी प्रभावकारी है।

जाइम टेबलेट (झण्डु)- Zyme Tablet (Zandu)- अजीर्ण तथा अम्लपित्त में लाभकर है। डाइमैक्स सीरप ( प्रताप फार्मा)-2 चम्मच दिन 2/3 बार अम्लपित्त की समस्त अवस्थाओं में निरापद औषधि है।

इथीइन्जाइम गोली व सीरप (मेडिकल इथिक्स)-

Ethinzyme Tablet & Syrup (Medical Ethics)- 1/2 गोली दिन में 2-3 बार दें तथा सीरप आधा चम्मच दिन में 2 या 3 बार दें। पित्तशामक है।

अम्लपित्तान्तक योग (वैद्यनाथ)- Acidic yoga (Vaidyanath)-Ethinzyme Tablet & Syrup (Medical Ethics)- आधा चम्मच दिन में 2-3 बार अम्लपित्त में निश्चित लाभकारी है।

अग्नि-ब्ल्लभ क्षार (धन्वन्तरि अलीगढ़, ज्वाला फार्मेसी)- Agni-Ballabh Kshar (Dhanvantari Aligarh, Jwala Pharmacy)- आधा चम्मच दिन में 2-3 बार दें। अम्लपित्त में निश्चित लाभकारी है।

मुत्रल पाउडर (वैद्यनाथ)-

Mutral Powder (Vaidyanath)- 2 से 10 ग्राम तक पाउडर जल के साथ प्रयोग करायें । अम्ल पित्त में आशातींत लाभ होगा यह औषधि रुका हुआ मूत्र बाहर निकाल देती है।

अग्नि संदीपन कैपसूल (जी.ए.मिश्रा)- Agni Sandipan Capsul (GA Mishra)- आधा कैपसूल दिन में 2 बार या आवश्यकतानुसार।

अमृतत रसायन (त्रिमूर्ति)- Amritat Rasayan (Trimurti)- 5 से 10 ग्राम 2-3 बार दें । स्वादिष्ट तथा अम्लपित नाशक रसायन है।

घरेलू योग-Domestic yoga एसिडिटी घरेलू उपाय

करेले के फूल या पत्तों को घी में भूनकर उनका चूर्ण बनाले। 1-2 ग्राम चूर्ण दिन में 2/3 बार खाने से अम्ल पित्त में लाभ होता है।

जीरा (श्वेत) तथा धनिया को बराबर मात्रा में लेकर चूर्ण बनाकर खिलायें, अम्लपित्त में लाभप्रद है।

सन्तरे के रस में थोड़ा जीरा (भुना हुआ) और थोड़ी मात्रा में सैंधा नमक मिलाकर पिलाने से अम्लपित्त में लाभ होता है।

बच के चुर्ण को 2-4 रक्ती की मात्रा में शहद या गुड़ के साथ सेवन करने से अम्लपित्त में लाभ होता है।

নিत्य 1 तोला चूने का निधरा हुआ पानी पीने से अम्लपित्त में आशातीत लाभ होता है।
पिप्पलो चुर्ण 3 ग्राम की मात्रा में मिश्री के साथ नित्य सेवन करने से अम्लपित्त में लाभ होता है। एक माह प्रयोग करें।

मुलहठी के चूर्ण को मधु तथा धृत की असमान मात्रा में मिलाकर चटाने से अम्लपित्त में लाभ होता है। यदि शहद 5 ग्राम लें तो घृत 10 ग्राम।

मुनक्का 50 ग्राम तथा सोफ 25 ग्राम दोनों को जौ कूट कर 200 ग्राम पानी में रात को भिगों दें। प्रात:काल मसल, छान कर उसमें दस ग्नराम मिश्री मिलाकर पिलायें। अम्लपित्त में लाभ होता है।

शंख भस्म 1 ग्राम तथा सोंठ का चूर्ण आधा ग्राम दोनों को मिलाकर शहद के साथ चटावें । अम्ल पित्त दूर भाग जाता है।

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Home Remedies To Control High Blood Pressure, उच्च रक्तचाप…………..

Home Remedies To Control High Blood Pressure, उच्च रक्तचाप………………..

 

उच्च रक्तचाप यानी High Blood Pressure की समस्या से बहुत से लोग जूझ रहे हैं। दुनिया भर में करीब 1 बिलियन से ज्यादा लोग इससे प्रभावित है। ऐसे लोगों को हर रोज अपने ब्लड प्रेशर की जाँच करते रहना चाहिए। इसमें जरा भी लापरवाही करने से काफी नुकसान हो सकता है।

अगर हम Blood Pressure को नियंत्रित नहीं रखते हैं तो इससे हृदयरोग या हृदयाघात का भी खतरा रहता है। इसके अतिरिक्त हाई ब्लड प्रेशर से किड़नी को भी क्षति पहुंच सकती है। ऐसे में इसको नियंत्रित करने के लिए लोग बहुत से दवाओं का सेवन भी करते हैं, परंतु यहां हम आपको हाई ब्लड प्रेशर को कंट्रोल रखने के कुछ ऐसे घरेलू उपाय बता रहे हैं, जो इसमें काफी उपयोगी हो सकते हैं। इसके साथ हीं इसको नियंत्रित रखने के लिए कुछ विशेष बातों को ध्यान में रखना और उनका पालन करना भी अनिवार्य है।

उच्च रक्तचाप को कंट्रोल करने के लिए आजमाएं ये घरेलु उपाय

हाई ब्लड प्रेशर को सामान्य करने हेतु हम जो घरेलू उपाय बताने जा रहे हैं, वह आपकी रसोई में हीं है। क्योंकि हमारे किचन में मौजूद मसालों आदि में अनेक औषधिय गुण पाए जाते हैं, जिनका प्रयोग हम औषधिय उपचार हेतु भी कर सकते हैं। तो अब आइए जान लेते हैं कि उच्च रक्तचाप यानी हाई ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करने के लिए हमलोग किन किन घरेलु तरीकों का उपयोग कर सकते हैं।

धनिया चूर्ण का सेवन –

हाई ब्लड प्रेशर से ग्रसित व्यक्ति को कोरिएंडर अर्थात धनिए के चूर्ण का सेवन करना चाहिए। ये हाई बीपी को समान्य करने में मदद करता है। इसके लिए धनिया को भूनकर उसका चूर्ण बना लीजिए और उसमें थोड़ा सा शक्कर मिलाकर प्रतिदिन इसका सेवन कीजिये। इससे उच्च रक्तचाप कंट्रोल में रहता है। अगर डायबिटीज के मरीज हैं तो बिना शक्कर मिलाए सिर्फ धनिया के चूर्ण को पानी के साथ लें।

मेथी और अजवायन का पानी –

High Blood Pressure में मेथी एवं अजवायन का पानी भी बहुत लाभकारी होता है। हाई बीपी के रोगियों को इससे काफी लाभ मिलता है। इसके लिए एक चम्मच मेथी और अजवायन के चूर्ण को पानी में डालकर रातभर के लिए छोड दीजिए। अगले रोज सुबह में इसे छानकर खाली पेट इसका पानी पिएं, लाभ मिलेगा।

त्रिफला की औषधि –

त्रिफला वास्तव में 3 फलों आंवला, बिभीतिका और हरितिका का मिश्रण है। जिनका प्रयोग कई रोगों के उपचार हेतु किया जाता है यह High Blood Pressure में भी फायदेमंद होता है। इसके लिए 20 ग्रा. त्रिफला लें और इसको रात में पानी में भिगाकर रख दें। अगले दिन सुबह इस पानी को छानकर, इसमें 2 चम्मच शहद मिला कर इसको पिएं। इससे ब्लड प्रेशर कंट्रोल करने में मदद मिलती है।

दालचीनी की चाय –

प्रतिदिन सुबह में दालचीनी की चाय पीने से भी हाई ब्लड प्रेशर कंट्रोल में रहता है। इसको तैयार करना भी बहुत ही आसान है। इसके लिए नॉर्मल चाय तैयार करते वक्त जब ये उबलना शुरू हो जाए, तब इसमें 1 चम्मच दालचीनी का पाउडर डाल दीजिए, या फिर आप साबुत दालचीनी को कूट कर भी डाल सकते हैं। इसे थोड़ी देर तक और उबलने दें। इसके बाद छानकर सामान्य चाय की तरह पिएं।

कुछ अन्य सुझाव –

इन सब उपायों को अपनाने के साथ ही साथ High Blood Pressure के मरीजों को अपनी दैनिक क्रियाकलाप और जीवनशैली में सुधार लाना भी जरूरी है। साथ हीं कुछ और बातों का भी ध्यान रखना चाहिए।

जैसे कि सोने और जागने का वक्त निश्चित करना, तनाव मुक्त रहना, रोज योग और कसरत करना, शरीर में ब्लड सर्कुलेशन को सुचारू बनाने के लिए सप्ताह में तीन से चार बार शरीर की मालिश करवाना, भोजन में नमक बहुत ही कम मात्रा में लेना आदि। इस प्रकार से आप High Blood Pressure को नियंत्रित रख सकते हैं।

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पेट और वजन कम करने के सबसे बेहतरीन उपाय, weight loss treatment…………..

पेट और वजन कम करने के सबसे बेहतरीन उपाय, weight loss treatment…………..

 

 

पेट और वजन या यूँ कहे के मोटापा घटाने के लिए खान-पान में सुधार जरूरी है। कुछ प्राकृतिक चीजें ऐसी हैं, जिनके सेवन से वजन नियंत्रित रहता है। इसलिए यदि आप वजन कम करने के लिए बहुत मेहनत नहीं कर पाते हैं तो अपनाएं यहां बताए गए छोटे-छोटे उपाय।

ये आपके बढ़ते वजन को कम कर देंगे।

1) सब्जियों और फलों में कैलोरी कम होती है, इसलिए इनका सेवन अधिक मात्रा में करें। केला और चीकू न खाएं। इनसे मोटापा बढ़ता है। पुदीने की चाय बनाकर पीने से मोटापा कम होता है।

2) खाने के साथ टमाटर और प्याज का सलाद काली मिर्च व नमक डालकर खाएं। इनसे शरीर को विटामिन सी, विटामिन ए, विटामिन के, आयरन, पोटैशियम, लाइकोपीन और ल्यूटिन मिलेगा। इन्हें खाने के बाद खाने से पेट जल्दी भर जाएगा और वजन नियंत्रित हो जाएगा।

3) पपीता नियमित रूप से खाएं। यह हर सीजन में मिल जाता है। लंबे समय तक पपीता के सेवन से कमर की अतिरिक्त चर्बी कम होती है।

4) दही का सेवन करने से शरीर की फालतू चर्बी घट जाती है। छाछ का भी सेवन दिन में दो-तीन बार करें।

5) छोटी पीपल का बारीक चूर्ण पीसकर उसे कपड़े से छान लें। यह चूर्ण तीन ग्राम रोजाना सुबह के समय छाछ के साथ लेने से बाहर निकला हुआ पेट अंदर हो जाता है।

6) आंवले व हल्दी को बराबर मात्रा में पीसकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को छाछ के साथ लें। कमर एकदम पतली हो जाएगी।

7) मोटापा कम नहीं हो रहा हो तो खाने में कटी हुई हरी मिर्च या काली मिर्च को शामिल करके बढ़ते वजन पर काबू पाया जा सकता है। एक रिसर्च में पाया गया कि वजन कम करने का सबसे बेहतरीन तरीका मिर्च खाना है। मिर्च में पाए जाने वाले तत्व कैप्साइसिन से भूख कम होती है। इससे ऊर्जा की खपत भी बढ़ जाती है, जिससे वजन कंट्रोल में रहता है।

8) दो बड़े चम्मच मूली के रस में शहद मिलाकर बराबर मात्रा में पानी के साथ पिएं। ऐसा करने से 1 माह के बाद मोटापा कम होने लगेगा।

9) मालती की जड़ को पीसकर शहद मिलाकर खाएं और छाछ पिएं। प्रसव के बाद होने वाले मोटापे में यह रामबाण की तरह काम करता है।

10) रोज सुबह-सुबह एक गिलास ठंडे पानी में दो चम्मच शहद मिलाकर पिएं। इस घोल को पीने से शरीर से वसा की मात्रा कम होती है।

11) ज्यादा कार्बोहाइड्रेट वाली वस्तुओं से परहेज करें। ज्यादा कार्बोहाइड्रेट वाली वस्तुओं से परहेज करें। शक्कर, आलू और चावल में अधिक कार्बोहाइड्रेट होता है। ये चर्बी बढ़ाते हैं।

12) केवल गेहूं के आटे की रोटी की बजाय गेहूं, सोयाबीन और चने के मिश्रित आटे की रोटी ज्यादा फायदेमंद है।

13) रोज पत्तागोभी का जूस पिएं। पत्तागोभी में चर्बी घटाने के गुण होते हैं। इससे शरीर का मेटाबॉलिज्म सही रहता है।

14) एक चम्मच पुदीना रस को 2 चम्मच शहद में मिलाकर लेते रहने से मोटापा कम होता है।

15) सुबह उठते ही 250 ग्राम टमाटर का रस 2-3 महीने तक पीने से वसा में कमी होती है।

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घुटनों की पीड़ा:कारण और निवारण,knee pain treatment

घुटनों की पीड़ा:कारण और निवारण,knee pain treatment………..

 

घुटनो में दर्द किसी चोट के कारण या आर्थराइटिस के कारण हो सकता हैं, घुटनो में दर्द, घुटनो में सूजन, उठते बैठते जोड़ो में कटक कटक की आवाज़ आना ये सभी इसी समस्या के प्रमुख लक्षण हैं। ऐसे में थोड़ी से सावधानी रखने से बढ़ती उम्र में भी इस दर्द से छुटकारा पाया जा सकता हैं।

घुटनो के दर्द के प्रकार।

घुटनों के अंदरूनी या मध्य भाग में दर्द छोटी मोटी चोंटों या आर्थराईटीज के कारण हो सकता है। लेकिन घुटनों के पीछे का दर्द उस जगह द्रव संचय होने से होता है इसे बेकर्स सिस्ट कहते हैं। सीढ़ियों से नीचे उतरते वक्त अगर घुटनों में दर्द होता है तो इसे नी केप समस्या जाननी चाहिए। यह लक्षण कोंट्रोमलेशिया का भी हो सकता है। सुबह के वक्त उठने पर अगर आपके घुटनों में दर्द होता है तो इसे आर्थराईटीज की शुरू आत समझनी चाहिए। चलने फिरने से यह दर्द धीरे-धीरे कम हो जाता है। बिना किसी चोंट या जख्म के अगर घुटनों में सूजन दिखे तो यह ओस्टियो आर्थराईटीज, गाऊट अथवा जोड़ों का संक्रमण की वजह से होता है।

आइये जानते हैं घुटनो के दर्द को दूर करने के लिए घरेलु उपचार।

घुटनों के दर्द की चिकित्सा –

घुटनों में दर्द को कम करने के लिए गरम या ठंडे पेड से सिकाई की जरूरत हो सकती है। घुटनों में तीव्र पीड़ा होने पर आराम की सलाह डी जाती है ताकि दर्द और सूजन कम हो सके। फिजियो थेरपी में चिकित्सक विभिन्न प्रक्रियाओं के द्वारा घुटनों के दर्द और सूजन को कम करने का प्रयास करते हैं।

केल्शियम

अस्थियों को मजबूत बनाए रखने के लिए केल्शियम का सेवन करना उपकारी है। अगर पत्थरी की शिकायत नहीं है तो आप चूना गेंहू के दाने के बराबर दही में डाल कर नित्य खाए। या अनार के रस में मिला कर या गाजर के रस में मिला कर खाए। दूध ,दही,ब्रोकली में पर्याप्त केल्शियम होता है।

दाल चीनी,जीरा,अदरक और हल्दी

घुटनों के लचीलेपन को बढाने के लिए दाल चीनी,जीरा,अदरक और हल्दी का उपयोग उत्तम फलकारी है। इन पदार्थों में ऐसे तत्त्व पाए जाते हैं जो घुटनों की सूजन और दर्द का निवारण करते हैं।

गाजर

गाजर में जोड़ों में दर्द को दूर करने के गुण मौजूद हैं। चीन में सैंकडों वर्षों से गाजर का इस्तेमाल संधिवात पीड़ा के लिए किया जाता रहा है। गाजर को पीस लीजिए और इसमें थोड़ा सा नीम्बू का रस मिलाकर रोजाना खाना उचित है।यह घुटनों के लिगामेंट्स का पोषण कर दर्द निवारण का काम करता है।

मैथी के बीज

मैथी के बीज संधिवात की पीड़ा निवारण करते हैं।एक चम्मच मैथी बीज रात भर साफ़ पानी में गलने दें। सुबह पानी निकाल दें और मैथी के बीज अच्छी तरह चबाकर खाएं| शुरू में तो कुछ कड़वा लगेगा लेकिन बाद में कुछ मिठास प्रतीत होगी। भारतीय चिकित्सा में मैथी बीज की गर्म तासीर मानी गयी है। यह गुण जोड़ों के दर्द दूर करने में मदद करता है।

प्याज

प्याज अपने सूजन विरोधी गुणों के कारण घुटनों की पीड़ा में लाभकारी हैं। दर असल प्याज में फायटोकेमीकल्स पाए जाते हैं जो हमारे इम्यून सिस्टम को ताकतवर बनाते हैं। प्याज में पाया जाने वाला गंधक जोड़ों में दर्द पैदा करने वाले एन्जाईम्स की उत्पत्ति रोकता है। एक ताजा रिसर्च में पाया गया है कि प्याज में मोरफीन की तरह के पीड़ा नाशक गुण होते हैं।

गरम तेल

गरम तेल से हल्की मालिश करना घुटनों के दर्द में बेहद उपयोगी है। एक बड़ा चम्मच सरसों के तेल में लहसुन की २ कुली पीसकर डाल दें। इसे गरम करें कि लहसुन भली प्रकार पक जाए। आच से उतारकर मामूली गरम हालत में इस तेल से घुटनों या जोड़ों की मालिश करने से दर्द में तुरंत राहत मिल जाती है। इस तेल में संधिवात की सूजन दूर करने के गुण हैं। घुटनों की पीड़ा निवारण की यह असरदार चिकित्सा है।

नारियल की गिरी

प्रतिदिन नारियल की गिरी का सेवन करें। इससे घुटनों को ताकत आती है।

अखरोट की गिरी

लगातार 20 दिनों तक अखरोट की गिरी खाने से घुटनों का दर्द समाप्त होता है।

लहसन दही

बिना कुछ खाए प्रतिदिन प्रात: एक लहसन कली, दही के साथ दो महीने तक लेने से घुटनों के दर्द में चमत्कारिक लाभ होता है।

जोड़ों की पीड़ा दूर करने के लिये तेल

जोड़ों की पीड़ा दूर करने के लिये तेल निर्माण करने का एक बेहद असरदार फार्मूला नीचे लिख रहा हूँ ,जरूर प्रयोग करें-

काला उड़द 10 ग्राम ,बारीक पीसा हुआ अदरक 5 ग्राम ,पीसा हुआ कर्पूर 2 ग्राम लें। ये तीनों पदार्थ 50 ग्राम सरसों के तेल में 5 मिनिट तक गरम करें और आंच से उतारकर छानकर बोतल में भर लें। मामूली गरम इस तेल से जोड़ों की मालिश करने से दर्द में आराम मिलता है। दिन में 2-3 बार मालिश करना उचित है। यह तेल आर्थ्रराईटीज जैसे दर्दनाक रोगों में भी गजब का असर दिखाता है।

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सोरायसिस या vitiligo भयानक चर्म रोग सफ़ल चिकित्सा ,Psoriasis vitiligo Treatment At home

सोरायसिस या vitiligo भयानक चर्म रोग सफ़ल चिकित्सा ,Psoriasis vitiligo Treatment At home…………….

 

सोरियासिस एक प्रकार का चर्म रोग है जिसमें त्वचा में सेल्स की तादाद बढने लगती है।चमडी मोटी होने लगती है और उस पर खुरंड और पपडियां उत्पन्न हो जाती हैं। ये पपडिया सफ़ेद चमकीली हो सकती हैं।इस रोग के भयानक रुप में पूरा शरीर मोटी लाल रंग की पपडीदार चमडी से ढक जाता है।यह रोग अधिकतर केहुनी,घुटनों और खोपडी पर होता है। अच्छी बात ये कि यह रोग छूतहा याने संक्रामक किस्म का नहीं है। रोगी के संपर्क से अन्य लोगों को कोई खतरा नहीं है। माडर्न चिकित्सा में अभी तक ऐसा परीक्षण यंत्र नहीं है जिससे सोरियासिस रोग का पता लगाया जा सके। खून की जांच से भी इस रोग का पता नहीं चलता है।

सोरायसिस का इलाज :

यह रोग वैसे तो किसी भी आयु में हो सकता है लेकिन देखने में ऐसा आया है कि 10 वर्ष से कम आयु में यह रोग बहुत कम होता है। 15 से 40 की उम्र वालों में यह रोग ज्यादा प्रचलित है। लगभग 1 से 3 प्रतिशत लोग इस बीमारी से पीडित हैं। इसे जीवन भर चलने वाली बीमारी की मान्यता है।

चिकित्सा विग्यानियों को अभी तक इस रोग की असली वजह का पता नहीं चला है। फ़िर भी अनुमान लगाया जाता है कि शरीर के इम्युन सिस्टम में व्यवधान आ जाने से यह रोग जन्म लेता है।इम्युन सिस्टम का मतलब शरीर की रोगों से लडने की प्रतिरक्षा प्रणाली से है। यह रोग आनुवांशिक भी होता है जो पीढी दर पीढी चलता रहता है।इस रोग का विस्तार सारी दुनिया में है। सर्दी के दिनों में इस रोग का उग्र रूप देखा जाता है। कुछ रोगी बताते हैं कि गर्मी के मौसम में और धूप से उनको राहत मिलती है। एलोपेथिक चिकित्सा मे यह रोग लाईलाज माना गया है। उनके मतानुसार यह रोग सारे जीवन भुगतना पडता है।लेकिन कुछ कुदरती चीजें हैं जो इस रोग को काबू में रखती हैं और रोगी को सुकून मिलता है।

मैं आपको एसे ही उपचारों के बारे मे जानकारी दे रहा हूं—

1) बादाम 10 नग का पावडर बनाले। इसे पानी में उबालें। यह दवा सोरियासिस रोग की जगह पर लगावें। रात भर लगी रहने के बाद सुबह मे पानी से धो डालें। यह उपचार अच्छे परिणाम प्रदर्शित करता है। सोरायसिस का इलाज

2) एक चम्मच चंदन का पावडर लें।इसे आधा लिटर में पानी मे उबालें। तीसरा हिस्सा रहने पर उतारलें। अब इसमें थोडा गुलाब जल और शकर मिला दें। यह दवा दिन में 3 बार पियें।बहुत कारगर उपचार है।

3) पत्ता गोभी सोरियासिस में अच्छा प्रभाव दिखाता है। उपर का पत्ता लें। इसे पानी से धोलें।हथेली से दबाकर सपाट कर लें।इसे थोडा सा गरम करके प्रभावित हिस्से पर रखकर उपर सूती कपडा लपेट दें। यह उपचार लम्बे समय तक दिन में दो बार करने से जबर्दस्त फ़ायदा होता है। सोरायसिस का इलाज

4) पत्ता गोभी का सूप सुबह शाम पीने से सोरियासिस में लाभ होते देखा गया है।प्रयोग करने योग्य है।

5) नींबू के रस में थोडा पानी मिलाकर रोग स्थल पर लगाने से सुकून मिलता है। नींबू का रस तीन घंटे के अंतर से दिन में ५ बार पीते रहने से छाल रोग ठीक होने लगता है। सोरायसिस का इलाज , सफ़ेद दाग का इलाज

6)शिकाकाई पानी मे उबालकर रोग के धब्बों पर लगाने से नियंत्रण होता है।

7) केले का पत्ता प्रभावित जगह पर रखें। ऊपर कपडा लपेटें। फ़ायदा होगा।

8) कुछ चिकित्सक जडी-बूटी की दवा में steroids मिलाकर ईलाज करते हैं जिससे रोग शीघ्रता से ठीक होता प्रतीत होता है। लेकिन ईलाज बंद करने पर रोग पुन: भयानक रूप में प्रकट हो जाता है। ट्रायम्सिनोलोन स्टराईड का सबसे ज्यादा व्यवहार हो रहा है। यह दवा प्रतिदिन 12  से 16 एम.जी. एक हफ़्ते तक देने से आश्चर्यजनक फ़ायदा दिखने लगता है लेकिन दवा बंद करने पर रोग पुन: उभर आता है। जब रोग बेहद खतरनाक हो जाए तो योग्य चिकित्सक के मार्ग दर्शन में इस दवा का उपयोग कर नियंत्रण करना उचित माना जा सकता है।

9) इस रोग को ठीक करने के लिये जीवन शैली में बदलाव करना जरूरी है। सर्दी के दिनों में 3 लीटर और गर्मी के मौसम मे 5 से 6 लीटर पानी पीने की आदत बनावें। इससे विजातीय पदार्थ शरीर से बाहर निकलेंगे।  

10) सोरियासिस चिकित्सा का एक नियम यह है कि रोगी को 10 से 15 दिन तक सिर्फ़ फ़लाहार पर रखना चाहिये। उसके बाद दूध और फ़लों का रस चालू करना चाहिये।

11) रोगी के कब्ज निवारण के लिये गुन गुने पानी का एनीमा देना चाहिये। इससे रोग की तीव्रता घट जाती है।

12) अपरस वाले भाग को नमक मिले पानी से धोना चाहिये फ़िर उस भाग पर जेतुन का तेल लगाना चहिये।

13) खाने में नमक वर्जित है।

14) पीडित भाग को नमक मिले पानी से धोना चाहिये।

15) धूम्रपान करना और अधिक शराब पीना विशेष रूप से हानि कारक है। ज्यादा मिर्च मसालेदार चीजें न खाएं।

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Ayurvedic treatment for piles ,बवासीर या पाइल्स का आयुर्वेदिक इलाज

Ayurvedic treatment for piles ,बवासीर या पाइल्स का आयुर्वेदिक इलाज………..

 

बवासीर या पाइल्स एक ऐसी समस्या है जिसमें गुदामार्ग मैं और बाहरी हिस्से की नसों में सूजन आ जाती है। इसकी वजह से गुदा के अंदरूनी हिस्से में या बाहर के हिस्से में कुछ मस्से जैसी आकृति बन जाती हैं, जिनमें से कई बार खून / रक्त निकलता है और दर्द भी होता है। कभी-कभी माल त्याग करते समय जोर लगाने पर ये मस्से बाहर की ओर आ जाते है। यदि परिवार में किसी को ऐसी समस्या रही है तो आगे की पीढ़ी में इसके पाए जाने की आशंका बनी रहती है। बवासीर या पाइल्स का आयुर्वेदिक इलाज |

पाइल्स और फिशर में अंतर | Difference between piles and fissure :

कई बार पाइल्स और फिशर में लोग कंफ्यूज हो जाते हैं। फिशर भी गुदा का ही रोग है, लेकिन इसमें गुदा में क्रैक हो जाता है। यह क्रैक छोटा सा भी हो सकता है और इतना बड़ा भी कि इससे खून आने लगता है।

पाइल्स की स्टेज: पाइल्स की चार स्टेज होती हैं जो क्रमशः हैं

1 : यह शुरुआती स्टेज होती है। इसमें कोई खास लक्षण दिखाई नहीं देते। कई बार मरीज को पता भी नहीं चलता कि उसे पाइल्स हैं। मरीज को कोई खास दर्द महसूस नहीं होता। बस हल्की सी खारिश महसूस होती है और जोर लगाने पर कई बार हल्का खून आ जाता है। इसमें पाइल्स अंदर ही होते हैं।

2: दूसरी स्टेज में मल त्याग के वक्त मस्से बाहर की ओर आने लगते हैं, लेकिन हाथ से भीतर करने पर वे अंदर चले जाते हैं। पहली स्टेज की तुलना में इसमें थोड़ा ज्यादा दर्द महसूस होता है और जोर लगाने पर खून भी आने लगता है।

3 : यह स्थिति थोड़ी गंभीर हो जाती है क्योंकि इसमें मस्से बाहर की ओर ही रहते हैं। हाथ से भी इन्हें अंदर नहीं किया जा सकता है। इस स्थिति में मरीज को तेज दर्द महसूस होता है और मल त्याग के साथ खून भी ज्यादा आता है।

4 : ग्रेड 3 की बिगड़ी हुई स्थिति होती है। इसमें मस्से बाहर की ओर लटके रहते हैं। जबर्दस्त दर्द और खून आने की शिकायत मरीज को होती है। इंफेक्शन के चांस बने रहते हैं।

बवासीर के लक्षण | Symptoms of piles  :

मल त्याग करते वक्त तेज चमकदार रक्त का आना या म्यूकस का आना।
एनस के आसपास सूजन या गांठ सी महसूस होना।

एनस के आसपास खुजली का होना।
मल त्याग करने के बाद भी ऐसा लगते रहना जैसे पेट साफ न हुआ हो।
पाइल्स के मस्सों में सिर्फ खून आता है, दर्द नहीं होता। अगर दर्द है तो इसकी वजह है इंफेक्शन।

पाइल्स के कारण | Causes of piles  :

कब्ज पाइल्स की सबसे बड़ी वजह होती है। कब्ज होने की वजह से कई बार मल त्याग करते समय जोर लगाना पड़ता है और इसकी वजह से पाइल्स की शिकायत हो जाती है।
ऐसे लोग जिनका काम बहुत ज्यादा देर तक खड़े रहने का होता है, उन्हें पाइल्स की समस्या हो सकती है।

गुदा मैथुन करने से भी पाइल्स की समस्या हो सकती है।
मोटापा इसकी एक और अहम वजह है।

कई बार प्रेग्नेंसी के दौरान भी पाइल्स की समस्या हो सकती है।
नॉर्मल डिलिवरी के बाद भी पाइल्स की समस्या हो सकती है।

1: आयुर्वेदिक दवाओं से :

नीचे दी गई दवाओं में से कोई एक ली जा सकती है।

रोज रात को एक चम्मच त्रिफला गर्म पानी से लें। इसे लेने के बाद कोई और चीज न खाएं।
रोज रात को ईसबगोल की भुस्सी एक चम्मच गर्म दूध से लें।

अभयारिष्ट या कुमारी आसव खाने के बाद चार चम्मच आधा कप सादा पानी में मिलाकर लें।
मस्सों पर लगाने के लिए सुश्रुत तेल आता है। इसे मस्सों पर लगा सकते हैं।

सूजन और दर्द है तो सिकाई की मदद से सकते हैं। इसके लिए एक टब में गर्म पानी ले लें और उसमें एक चुटकी पौटेशियम परमेंगनेट डाल दें। यह सिकाई हर मल त्याग के बाद करें।

2: क्षारसूत्र द्वारा :

स्टेज 2, 3 या 4 के पाइल्स के लिए आयुर्वेद में क्षारसूत्र चिकित्सा की जाती है। इसका तरीका नीचे दिया गया है। इसमें एक धागे का प्रयोग किया जाता है। कुछ आयुर्वेदिक दवाओं का यूज करके डॉक्टर इस धागे को बनाते हैं।इस क्षेत्र में कई झोलाछाप डॉक्टर भी हैं जो क्षारसूत्र से इलाज करने का दावा करते हैं। इनसे बचें। क्षारसूत्र अगर करा रहे हैं तो उन्हीं डॉक्टरों से कराएं, जिनके पास आयुर्वेद की डिग्री है।

3. डाइट : पाइल्स से बचने और अगर है तो उससे जल्द छुटकारा पाने के लिए यह खाएं:

ज्यादा से ज्यादा सब्जियों का सेवन करें। हरी पत्तेदार सब्जी खाएं। मटर, सभी प्रकार की फलियां, शिमला मिर्च, तोरी, टिंडा, लौकी, गाजर, मेथी, मूली, खीरा, ककड़ी, पालक। कब्ज से राहत देने के लिए बथुआ अच्छा होता है।

पपीता, केला, नाशपाती, अंगूर, सेब खाएं। मौसमी, संतरा, तरबूज, खरबूजा, आड़ू, कीनू, अमरूद बहुत फायदेमंद हैं।

जिस गेहूं के आटे की रोटी खाते हैं, उसमें सोयाबीन, ज्वार, चने आदि का आटा मिक्स कर लें। इससे आपको ज्यादा फाइबर मिलेगा।

टोंड दूध ही पीएं। शर्बत, शिकंजी, नींबू पानी या लस्सी ले सकते हैं।
दिन में कम से कम 8 गिलास पानी जरूर पिएं।

4: यह न खाएं :

फास्ट फूड, जंक फूड और मैदे से बनी खाने की चीजें।
चावल कम खाएं।
सब्जियों में भिंडी, अरबी, बैंगन न खाएं।
राजमा, छोले, उड़द, चने आदि।
मीट, अंडा और मछली।
शराब, सिगरेट और तंबाकू से बचें।

5: याद रहे :

ढीले अंडरवेयर पहनें। लंगोट आदि पहनना नुकसानदायक हो सकता है।
मल त्याग के दौरान जोर लगाने से बचें।
कोशिश करें कि मल त्याग का काम दो मिनट के भीतर पूरा करके आ जाएं।
टॉयलेट में बैठकर कोई किताब या पेपर पढ़ने की आदत से बचें।
हो सके तो इंडियन स्टाइल वाले टॉयलेट का ही यूज करें क्योंकि इसमें बैठने का तरीका ऐसा होता है कि पेट आसानी से साफ हो जाता है ।

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