Gallstone and its home remedies, पित्त की पथरी और घरेलू उपचार………..

Gallstone and its home remedies, पित्त की पथरी और घरेलू उपचार…………

 

किसी कारणवश पित्त (Bile) में बाधा पड़ने पर यह रोग उत्पन्न हो जाता है। जो लोग शारीरिक परिंश्रम न कर मानसिक परिश्रम अधिक करते हैं अथवा बैठे-बैठे दिन व्यतीत करते है तथा नाइट्रोजन और चर्बी वाले खाद्य पदार्थ अधिक मात्रा में खाते हैं, उन मनुष्यों को ही इस रोग से आक्रान्त होने की अधिक सम्भावना रहती है सौ में से दस रोगियों को 40 से 50 वर्ष की आयु के बाद और अधिकतर स्त्रियों को यह रोग हुआ करता है।

आधुनिक वैज्ञानिकों का मत है कि कुछ रोगों के कीटाणु (जैसे-टायफायड के कीटाणु) पित्ताशय में सूजन उत्तपन्न कर देते हैं जिस कारण पथरी बन जाती है। बी-कोलाई (B-Coli) नामक कीटाणु इस रोग का मुख्य कारण माना जाता है। यह पित्ताशय में साधारण रेत के करणों (1 से 100 तक) से लेकर दो इन्च लम्बी और एक इन्च तक चौड़ी होती है। पथरी जब तक पित्ताशय में रुकी रहती है तब तक रोगी को किसी भी तरह की कोई तकलीफ महसूस नहीं होती है। कभी-कभी पेट में दर्द मालूम होता है। किन्तु जब यह पथरी पित्ताशय से निकलकर पित्त-वाहिनी नली में पहुँचती है, तब पेट में एक तरह का असहनीय दर्द पैदा होकर रोगी को व्याकुल कर देता है। इस भयानक दर्द को पित्तशूल कहते है।

यह शूल दाहिनी कोख से शुरू होकर चारों ओर (दाहिने कन्धे और पीठ तक) फैल जाता है। और दर्द के साथ अक्सर कै (वमन) ठण्डा पसीना, नाड़ी कमजोर, हिंमांग (Callapse) कामला, साँस में कष्ट, मूर्छा आदि के लक्षण दिखलायी देते हैं। यह दर्द कई धन्टों से लेकर कई सप्ताह तक रह सकता है और जब पथरी आँत के अन्दर आ जाती हैं तब रोगी की तकलीफ दूर हो जाती है। और रोगी सो जाता है। जब तक पथरी स्थिर भाव में रहती है तब तक तकलीफ घट जाती है और जब पथरी हिलती डुलती है उसी समय तकलीफ पुनः बढ़ जाया करती है। इस प्रकार पथरी के हिलने-डुलने से तकलीफ बढ़ती-घटती रहती है यह क्रम कई অन्टों से लेकर कई सप्ताह तक चल सकता है। पित्ताशय शुल के लक्षण स्पष्ट होने पर पित्त पथरी का ज्ञान हो जाता है। यदि वैद्य (चिकित्सक) को निदान में सन्देह हो तो तुरन्त क६ (X-Ray) करा लेना चाहिए।

पित्त की पथरी के प्रमुख शास्त्रीय योग- Gallstones Annihilation Major Classical Yoga:- 

रस:- त्रिविक्रम रस 250 मि.ग्रा. दिन में 2 बार मधु से सभी प्रकार की अश्मरी में दे । पाषाण वज्रक रस 500 मि.ग्रा. से 1 ग्राम तक दिन में 2-3 बार कुलुभी क्वाथ से दें। सभी प्रकार की अश्मरी में लाभप्रद है । अपूर्वमालिनी बसन्त 125 मि.ग्रा. तक दिन में 2 3 बार बिजौरा निम्बूरस से दें।

क्रव्यादि रस 125-250 (मात्रा, अनुपान, लाभ, उपर्युक्त।

लौह- धात्री लौह व षरुणाद्य लौह 500 मि. ग्रा. दिन में 2 बार मधु से दें । समस्त अश्मरियों में लाभप्रद है।

भस्म- बदर पाषाण भस्म व वराटिका भस्म अनुपान नारिकेल जल से, अश्मरी भेदन हेतु वराटिका भस्म, पित्ताश्मरी में शूल शरमनार्थ।

गुग्गुल- गोकुरादि गुग्गुल 2 गोली दिन में 2 3 बार दुग्ध से दें वात श्लेष्म विकृति पर दें।

वटी- सर्वतो भद्दवटी 1 गोली दिन में 2 बार वह्वणादि क्वाथ से दें। लाभ वात कार्य उपसुका । चन्द्रप्रभा वटी 1 गोली दिन में 2 बार मूलक स्वरस दें। (लाभ उपर्युक्त) वात श्लैष्म वकृति पर। शिवा वटी मात्रा 2 गोली दिन में 2-3 बार शर्बत बिजूरी से लाभ उपरोक्त ।

क्षार पर्पटी- श्वेत पर्पटी 500 मि.ग्रा. नारिकेल जल से दिन में 3 बार, यवक्ार S00 मि.ग्रা. से 1 ग्राम तक अविमूत्र से तथा तिलादि क्षार मात्रा उपर्युक्त जल से दें । अश्मरी भेदक, मूत्र कुच्छ हर है।

चूर्ण- गोक्षुर चुर्ण, 3 ग्राम दिन में 2-3 बार अविदुग्ध से तथा पाषाण भेदादि चूर्ण उपयुक्त मात्रा में गौमूत्र से अश्मरी भेदक तथा मूत्र कृच्छहर उत्तम चूर्ण है।

आसव- चन्दासव पित्तानुबन्ध होने पर, पुनर्नवासव वातानुबन्ध होने पर, 15 से 25 मि. ली. समान जल मिलाकर भोजनोत्तर।

घृत- वरुणादि घृत, पाषाण भेदादि घृत, कुशादि घृत, कुलत्यादि घृत 5 से 10 ग्राम दिन में 2 बार गौ दुग्ध से सब प्रकार की अश्मरियों में कुछ समय लेने पर लाभदायक है।

अवलेह पाक- कुशावलेह पाषाण भेदक पाक 5 से 10 ग्राम दिन में 2 बार गोदुग्ध से लाभ उपर्युक्त है।

क्वाथ- वीरतव्वादि क्वाथ कफज में, पाषाण भेदादि क्वाथ वातज में, एलादि क्वाथ पित्तज में 20 मि.ली. दिन में दो बार।

त्रिकंटकादि क्वाथ 40 मि.ली. दिन में 2 बार 250 से 500 मि.ग्रा. शिलाजी मिलाकर-सभी प्रकार की अश्मरियों में लाभप्रद है।

चिकित्सा सूत्र- नया अश्मरी रोग औषधि से ठीक हो जाता है।, किन्तु पुराना शस्त्र कर्म से ठीक होता है। इस रोग में घृत पान करवाकर स्नेहन कराना उपयोगी है।

पित्त-की-पथरी-के-आयुर्वेदीय-पेटेण्ट-योग

सिस्टोन टेबलेट (हिमालय ड्रग)- 2 गोली दिन में 3-4 बार अश्मरी के निकल जाने तक यह अश्मरी को बाहर निकालने के लिए अत्यन्त निरापद प्रमाणित हुई है। कुछ समय तक नियमित सेवन से अश्मरी टूट-टूट कर बाहर निकल जाती है। मूत्रकृच्छ तथा मूत्र में जलन आदि में भी उपयोगी है।

आरूसिलन टेबलेट (चरक)- 1-2 गोली दिन में 3-4 बार। यह मूत्र मार्ग के तमाम रोगों में लाभकारी है, मूत्र खुलकर लाती है।, अश्मरी भेदक है। मूत्रल पाउडर (वैद्यनाथ) अवस्थानुसार एवं पत्रक में लिखे निर्देशानुसार दें। यह मूत्र खुलासा लाने के लिए उत्तम पाउडर है। अश्मरी- जन्य शूल में पंशाब लाकर शूल को शान्त करता है।

सूचीवेध- अपामार्ग (बुन्दलेखन्ड, जी.ए. मिश्रा) मूत्रकृच्छान्तक (जी.ए. मिश्रा) इन्द्रायन (जी.ए. मिश्रा, बुन्दलेखन्ड) गौखरू (जी.ए. मिश्रा , बुन्देलखन्ड) चन्दन (जी.ए. मिश्रा) सभी सूचीवेध मूत्रल तथा अश्मरी नाशक है। पापाण भेद (बुन्देलखन्ड) वरून, (बुन्देलखन्ड) मूत्रल (ए. वी एम.) शिलाजीत। सभी सूचीवेध मूत्र जनन की प्रक्रिया को बढ़ाते है । अश्मरी व मूत्राघात में लाभकर है। मूत्राशमरी में विशेष लाभदायक है। मात्रा-समस्त सूची वेधों की 1 से 2 मि.ली. तक मांसपेशी में।

पित्त की पथरी कुछ घरेलू योग,Gallstones  :-

प्याज को कतरकर जल से धोकर उसका 20 ग्राम रस निकाल कर उसमें 50 ग्राम मिश्री मिलाकर पिलाने से पथरी टूट कर पेशाब के द्वारा बाहर निकल जाती है।

नीबू का रस 6 ग्राम, कलमी शोरा 4 रक्ती, पिसे तिल 1 ग्राम ( यह खुराक की मात्रा है) शीतल जल के साथ दिन में 1 या 2 बार 21 दिन तक सेवन कराने से पथरी गल जाती है ।

मूली में गड्ढ़ा खोद उसमें शलगम के बीज डालकर गूँथा हुआ आटा ऊपर से लपेट कर भूभल में सेके। जब भरता हो जाये या पक जाये तब आग से निकालकर आटे को अलग कर खावें । पथरी-टुकड़े-टुकड़े होकर निकल जाती है।

पपीते की जड़ ताजी 6 ग्राम को जल 60 ग्राम में पीस छानकर 21 दिन तक पिलाने से पथरी गलकर निकल जाती है।

केले के खम्भे के रस या नारियल के 3-4 औंस जल में शोरा 1-1 ग्राम मिलाकर दिन में दो बार देते रहने से अश्मरी कण निकल जाते हैं और पेशाब साफ आ जाता है।

अशोक बीज 6 ग्राम को पानी के साथ सिल पर महीन पीसकर थोडे, से जल में घोलकर पीने से कुछ दिन में ही पथरी निर्मूल हो जाती है।

मूली का रस 25 ग्राम व यवक्षार 1 ग्राम दोनों को मिलाकर रोगी को पिलायें। पथरी गलकर निकल जायेगी।

टिडे का रस 50 ग्राम, जवाखार 16 ग्रेन (1 ग्रेन=31 चावल भर) दोनों को मिलाकर पीने से पथरी रेत बनकर मूत्र मार्ग से बाहर निकल जाती है।

केले के तने का जल 30 ग्राम, कलमी शोरा 25 ग्राम दूध 250 ग्राम तीनों को मिलाकर दिन में दो बार पिलायें । दो सप्ताह सेवन करायें । पथरी गलकर निकल जाती है।

सीताफल :-

लाल रग का कूष्मान्ड (सीताफल) खूब पका हुआ लेकर 250 ग्राम रस निकालें इसमें 3 ग्राम सेन्धा नमक मिलाकर पिला दें। प्रयोग दो सप्ताह नियमित दिन में 2 बार करायें । पथरी गलकर मूत्र मार्ग से निकल जाती है।

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